यहां जानें, गर्भाधान संस्कार क्या है और इससे क्या होते हैं फ़ायदे

हिंदू धर्म में 16 संस्कारों का विशेष महत्व है। इनमें सबसे पहले नंबर पर आता है गर्भधारण संस्कार। यह संसार आखिर जीवन से ही तो चल रहा है। ऐसे में इस संस्कार का महत्व और बढ़ जाता है। कहते हैं कि यदि गर्भधारण संस्कार का पालन करते हुए संतान को पैदा किया जाए, तो यह न केवल उसके इस जन्म को सफल बनाता है, बल्कि पूर्व के जन्मों के भी विकारों को दूर करने में भी सहायक होता है।

गर्भधारण संस्कार के बारे में संस्कृत में एक श्लोक है, जो इस प्रकार हैः

गर्भस्याऽऽधानं वीर्यस्थापनं स्थिरीकरणं।

यस्मिन्येन वा कर्मणा तद् गर्भाधानम्।।

इस श्लोक का अर्थ यह है कि यदि आप दीर्घायु संतान की चाहत रखते हैं तो आपको संतानरूपी बीज की स्थापना विधि और समय के अनुसार करनी चाहिए। इसकी स्थापना के लिए स्त्री की उम्र कम से कम रजोदर्शन के तीन साल बाद होना जरूरी है। उसी तरीके से पुरुषों के लिए भी यह उम्र 19 साल बताई गई है। यह भी कहा है कि विवाह करने के बाद चौथे दिन गर्भधान करना चाहिए। हालांकि उस दिन सही समय भी होना ज़रूरी है।

गर्भाधान के बारे में स्मृतिसंग्रह में भी संस्कृत में एक श्लोक है, जो इस प्रकार हैः

निषेकाद बैजिकं चैनो गार्भिकं चापमृज्यते।

क्षेत्रसंस्कारसिद्धिश्च गर्भाधानफलं स्मृतम्।।

इसका मतलब यह हुआ कि यदि आप सही विधि के मुताबिक संतान पैदा करते हैं, तो इससे न केवल गर्भ हर प्रकार के खतरे से मुक्त होता है, बल्कि होने वाली संतान भी बेहद योग्य होती है। यह भी जरूरी है कि गर्भाधान से पहले मां-बाप अपने तन-मन को स्वच्छ रखें। कहने का तात्पर्य है कि उनके आचार, विचार और व्यवहार में शुद्धता और सच्चाई होनी चाहिए। जब तक मानसिक तौर पर दोनों ही इसके लिए तैयार नहीं होते, उन्हें इस दिशा में आगे बढ़ने से बचना चाहिए।

इस वक्त करें गर्भाधान

स्त्रियों का ऋतुकाल आमतौर पर रजोदर्शन के 16 दिनों तक माना जाता है और इसी दौरान गर्भाधान करने की सलाह भी दी जाती है। माना गया है कि आरंभिक चार-पांच दिनों तक आप ऐसा न करें। इसके बाद के दिनों में कोई दिक्कत नहीं है। शुरुआत में मनाही इसलिए होती है कि इससे गंभीर बीमारियों की चपेट में आने की आशंका पैदा हो जाती है। सरल शब्दों में कहें तो रजोदर्शन से पांचवी, छठी, सातवीं, आठवीं, नौवीं, दसवीं, बारहवीं, पंद्रहवीं और सोलहवीं की रात्रि गर्भाधान के सबसे उपयुक्त है। वैसे एक और चीज भी यह भी है कि आप जिस तरह के संतान की ख्वाहिश रखते हैं, आपको गर्भाधान से पहले उन महापुरुष के चित्रों को देखना चाहिए। रात के तीसरे पहर में गर्भाधान सबसे अच्छा माना जाता है।

ऐसा हो आपका आचार-विचार

गर्भाधान के बाद पेट में पल रहा बच्चा संवेदनाओं के जरिये सब कुछ सुनता और समझता रहता है। इसलिए इस दौरान आपको अच्छी बातें सुननी चाहिए और पढ़नी भी चाहिए। साथ ही आपको तनाव और चिंता से खुद को दूर रखने की कोशिश करनी चाहिए। अभिमन्यु का उदाहरण याद करें। गर्भ के समय ही उसने चक्रव्यूह को भेदना सीख लिया था। महषि चरक ने बताया है कि गर्भाधान के बाद भोजन भी अच्छा होना चाहिए और चित्त भी प्रसन्न रखना चाहिए।

सारांश :गर्भाधान हिन्दू धर्म में वर्णित सोलह संस्कारों में पहला संस्कार है। यह संतान को जन्म देने के लिए जीवनसाथी के साथ यौन संबंध बनाने से पहले शरीर और मन की शुद्धि पर केंद्रित है। यह बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह एक आदर्श बच्चे के निर्माण में मदद करता है।

Summary: Conception is the first rite in the sixteen rituals described in Hinduism. It is focused on the purification of body and mind before having sex with a spouse to give birth to the child. It is considered very important because it helps in the formation of an ideal child.

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